हमें सृष्टि से सामन्जस्य स्थापित करने का स्वभाव पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परा से मिला है – डॉ. मोहन भागवत जी

नागपुर, 04 जून 2026।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘कार्यकर्ता विकास वर्ग – द्वितीय’ का समापन समारोह, गुरुवार 4 जून, 2026, अधिक ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्थी  को  रेशिमबाग मैदान में संपन्न हुआ। इस अखिल भारतीय वर्ग के समापन समारोह के  प्रमुख अतिथि  प्रसिद्ध उद्योगपति पद्मभूषण कुमार मंगलम बिरला जी रहे और सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत का उद्बोधन हुआ। कार्यक्रम में देश भर से आमंत्रित विशेष अतिथि पद्मश्री भारतभूषण जी त्यागी, पूज्य श्री योगी भवनाथ जी महाराज, महाराजा गज सिंह जी, गोपालभाई मावजी गोरसिया, दिव्यम जी त्रिपाठी, भार्गवभाई सुथार उपस्थित रहे।

समापन समारोह में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के उद्बोधन के मुख्य बिन्दु…..

  • हम अवरोध करने वाली शक्तियों को सफल न होने दें। यशस्वी होकर दुनिया को एक नया रास्ता देने वाला भारत बनाएँ।
  • भारत का समय आ गया है, हमें अपनी तैयारी तेज करनी है।
  • भारत का भविष्य जिस कंधे पर है, वह हिन्दू समाज संगठित हो रहा है और जागृत हो रहा है।
  • संघ के शताब्दी वर्ष के दो तिहाई कालखंड के बीच यह कार्यकर्ता प्रशिक्षण वर्ग सम्पन्न हो रहा है। इस बीच समाज जीवन के संपर्क अभियान का बहुत अच्छा अनुभव हो रहा है।
  • भारत आगे बढ़े, उसकी अनुकूलता है। परिस्थितियां भी उसी अनुरूप बन रही हैं। मुख्य अतिथि बिरला जी ने भी उसे अनुभव किया।
  • परिस्थिति पर काबू पाना उन्हीं के लिए संभव होता है जो परिस्थिति पर नियंत्रण करने का विचार पहले से करके चलते हैं।
  • व्यक्ति की स्वतंत्रता, समाज की स्वतंत्रता और सृष्टि का पोषण दुनिया अलग-अलग जानती है, पर सबका एक साथ पोषण करना नहीं जानती।
  • दुनिया को भारत की आवश्यकता है, क्योंकि सभी को साथ में जोड़ कर विकास की कल्पना भारत ही कर सकता है।
  • जीवन के लिए अर्थ और काम पुरूषार्थ होते हैं, इससे ऊब कर मोक्ष पाने की परिस्थिति उत्पन्न होती है, पर यह सब एक साथ कैसे हो, यह दुनिया नहीं जानती।
  • भारत का समय तो आ ही गया है। कलहों में फँसे, स्वार्थ में फँसे, अपना विकास और सृष्टि का विनाश – इनमें कोई बीच वाला रास्ता न पाने के कारण लड़खड़ाती हुई इस दुनिया को भारत की, और भारत की ही आवश्यकता है।
  • यह सारा ज्ञान पुस्तकों में है, व्याख्यान में भी यह बताया जाता है, पर उसका स्वभाव नहीं है। जबकि परिणाम तो आदत (स्वभाव) से ही आता है।
  • संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान होने के बाद भी यह परिस्थिति क्यों आई कि हमने 1000 वर्षों की गुलामी झेली।
  • संघ ने एक कार्यपद्धति ऐसी विकसित की ताकि सारी तरह की विभिन्नताओं के साथ हिन्दू समाज एकजुट आए।
  • हमें पीढ़ी दर पीढ़ी सृष्टि से सामन्जस्य स्थापित करने का स्वभाव परम्पराओं से मिला है।
  • हमने हजार वर्ष गुलामी झेली। जिन्होंने हमें गुलाम बनाया, वे कोई हमसे श्रेष्ठ नहीं थे। संख्या में भी वे हमसे अधिक नहीं थे। बहुत दूर से आकर उन्होंने हमको जीता। किसी मामले में वे हमसे बेहतर नहीं थे, हमसे बदतर ही थे। कुछ बातें हमारी थीं, जिन्हें हमने संभालकर नहीं रखा; हम उन्हें भूल गए। हमने अपनी तैयारी को खो दिया। उस तैयारी को हमें पुनः करना पड़ेगा।
  • हिन्दू भारत के लिए दायित्वशील है।
  • हम देखते हैं कि बल सम्पन्न देश मनमानी करते हैं। चाहे तो किसी देश को हथिया लो, चाहे तो किसी देश पर बम मार दो या दुनिया के तेल की सप्लाई बंद कर दो। ….भारत के बारे में यह विचार बने कि वह शक्ति सम्पन्न होकर ऐसा नहीं करेगा, बल्कि सबको साथ लेकर चलेगा।
  • सारी दुनिया देखे कि जिस नींव पर भारत का निर्माण हुआ है, वह विश्व बंधुत्व और वसुधैव कुटुम्बकम् की नींव पर है। तब वे देश अपनी प्रकृति के अनुरूप परस्पर मित्रता के आधार पर अपने देश का निर्माण करेंगे।
  • संघ ऐसा वातावरण का निर्माण करना चाहता है और ऐसा वातावरण बनाने वाले कार्यकर्ताओं का समूह खड़ा करना चाहता है।
  • हमारा देश धर्मप्राण देश है। अपने धर्म का संरक्षण करते हुए अपने राष्ट्र को परम वैभव-संपन्न बनाना है।
  • स्वबोध के आधार पर स्वार्थ और भेद को तिलांजलि देने वाले कार्यकर्ताओं का निर्माण करने का प्रयास है।
  • ऐसा काम हो कि हर देश के लोग सोचें कि हमारे देश में भी हमारा RSS होना चाहिए।
  • प्रत्यक्ष संघ की शाखा में आइये या फिर स्वयंसेवकों का सहयोग करिए या फिर स्वतः समाज और राष्ट्र हित में कोई भी कार्य करिए, हम स्वयं आप तक पहुंच जाएंगे।
  • हम जल्दी ही स्वामी विवेकानंद के उस स्वप्न को साकार होते देखेंगे, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत माता पहले से अधिक उच्च सिंहासन पर पहले से भी अधिक गौरव के साथ स्थापित हो रही है।

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