नागपुर, 29 नवम्बर।
नागपुर पुस्तक महोत्सव में ‘भारत बोध’ शीर्षक के तहत आयोजित युवा लेखक संवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि लेखन यह एक प्रतिभा है, वह सबके पास नहीं होती। शब्द भाव प्रवाहित करते हैं। सामने वाले के मन में परिवर्तन लाने वाला, प्रभावी परिणाम करने वाला भाव पहुंचाना, यह साहित्य है। साहित्य जीवनभर रहता है और हितकारी होता है। साहित्य मनुष्य जीवन को उन्नत और सच्चा मनुष्य बनाता है। पढ़ा-लिखा आदमी अधिक सुसंस्कृत है, ऐसा माना जाता है। साहित्य लिखने वालों का मनुष्य पर उपकार है। एक अर्थ से साहित्य लिखने वाले शब्द सृष्टि के ईश्वर हैं। और वह शब्द सृष्टि में जो भी करेंगे, वह मंगल ही होगा, हितकारी ही होगा, ऐसी श्रद्धा आज भी जनमानस में है। इसलिये लेखकों को इसका ध्यान रखकर लिखना चाहिए।
इस दौरान मंच पर नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रो. मिलिंद मराठे और ज़ीरो माईल फाऊंडेशन के अध्यक्ष प्रशांत कुकडे उपस्थित थे।
सरसंघचालक जी ने कहा कि यश का मापदंड लगाकर देखें तो दुनिया में बहुतांश लोग अयशस्वी हैं, उनका संपूर्ण बहुमत है। चमकने वाले थोड़े रहते हैं। लेकिन हर आदमी उस रास्ते पर रहता है। आदमी अपनी गलतियों से सीख लेकर आगे बढ़ता रहे तो वह एक दिन चमकने वाला बन जाएगा। परंतु यश थोड़े लोगों का और तात्कालिक होता है। अपना जीवन किसी काम में आ गया, उस का कुछ उपयोग हुआ, ये बात सार्थकता की है और यश कदाचित तात्कालिक आनंद देता होगा, सार्थकता पूरे जीवन में संपूर्ण समाधान उत्पन्न करने वाली होती है।
उन्होंने कहा कि ज्ञान साहित्य से मिलता है। बोला हुआ सुनते हैं, लिखा हुआ पढ़ते हैं और जिया हुआ देखते हैं। साहित्य सृजनता, लेखक का गुणधर्म है। उसके मन में भाव उत्पन्न होते हैं, उसके निरीक्षण से उन भावों को वो अक्षरों से कागज पर व्यक्त करता है।
लेखक जो लिख रहे हैं मनुष्यता की दृष्टि से ठीक है कि नहीं, शब्द का प्रयोग ठीक है या नहीं, इसे देखने की आवश्यकता है। भारत की बातों का भाव ठीक से पहुंचाने वाले शब्द अंग्रेजी में नहीं हैं। वैसे ही विदेशी भाषा के भाव भी भारतीय भाषा में नहीं आ सकते। इसलिये जिस भाषा में लिखते हैं, उस भाषा में भाव पहुंचाना यह बड़ी महत्त्व की बात है।
मोहन भागवत जी ने कहा कि हम समाज में काम करते हैं, लोग हमें राष्ट्रवादी कहते हैं। लेकिन हम कभी वाद नहीं करते, विवाद से दूर रहते हैं। बहार के देशों को विवाद, संघर्ष करना पड़ा, इसलिये वहां यह ‘इज़्म’ शब्द आया। उनकी नेशन की कल्पना भिन्न है। उन्होंने राष्ट्र को नेशन और राष्ट्र-वाद को नेशनलिज़्म बना दिया। हमारे यहां राष्ट्र वाद का विषय है ही नहीं। हमारा राष्ट्र प्राचीन काल से है। हम राष्ट्रीयता, नेशनलिटी या नेशनहुड कहते हैं। राष्ट्रत्व भी हो सकता है। आप अपने लेखन में नेशन शब्द से राष्ट्र का भाव पहुंचाने की कोशिश करोगे तो हमें अपेक्षित भाव नहीं मिलेगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स पर सरसंघचालक जी ने कहा कि हमने स्वयं को यंत्र नहीं बनाना है। टेक्नोलॉजी है वह आएगी ही। लेकिन आने के बाद भी मालिक हम बने रहें, नियंत्रण हमारा रहे। हम अपनी इच्छा से उसका उपयोग करें। यह साधन है, उनका जनकल्याण के लिये उपयोग करना चाहिए। एआई का उपयोग मानव हित के लिये करना पड़ेगा। एआई के कारण मनुष्य की भावनाओं का क्या, ऐसा डर लगता है, लेकिन वह एआई अभी आया नहीं है। वो आने के पहले हम तैयार हो जाएं और उसका मालिक बनने की तैयारी करें।
भारतीय और आधुनिक शिक्षा पर उन्होंने कहा कि आज फिनलैंड में मिलने वाली शिक्षा अच्छी है। वहां के विद्यार्थी अव्वल रहते हैं। उनको स्पर्धा में रुचि नहीं है। वे विद्यार्थियों को शिक्षा देकर संघर्ष के लिये तैयार करते हैं। शाश्वत और हितकारक शिक्षित व्यक्ति को दरदर भटकना ना पड़े। शिक्षा से संस्कार मिले, सुसंस्कृतता मिले। शिक्षा सबके लिये सुलभ और सस्ती होनी चाहिये और वह विद्यार्थियों तक पहुंचनी चाहिए।
ग्लोबलाइजेशन पर उन्होंने कहा कि यह गलत संकल्पना है। विश्व के सारे देश, सारा समाज एक जैसा नहीं हो सकता। भिन्न-भिन्न परिस्थिति अनुसार वहां के प्रश्न और उसके समाधान की व्यवस्था अलग- अलग होती है। लेकिन सारे विश्व के बारे में एक कुटुंब का भाव रखकर हम चल सकते हैं। वसुधैव कुटुंबकम् यह हमारी प्राचीन धारणा रही है जो ग्लोबलाइजेशन से अलग और बेहतर है।
Gen Z को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि वे अपनी परम्परा, अपना इतिहास मूल रूप में समझ लें। विकिपीडिया पर निर्भर रहकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना गलत होगा। अपनी संस्कृति में परंपरा आंख मूंदकर नहीं अपनाई जाती। अपनी परम्परा परिवर्तनीय है। वह कैसे विकसित हुई, इसका हम लॉजिकली तर्कशुद्ध तरीके से अभ्यास करेंगे तो यह पीढ़ी परम्परा को और समृद्ध बनाकर आगे ले जा सकती है।